बच्चों को भी हो सकता है ब्रेन स्ट्रोक—अचानक कमजोरी या बोलने में परेशानी को न करें नजरअंदाज
ब्रेन स्ट्रोक केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं है। यह नवजात शिशुओं, बच्चों और किशोरों को भी हो सकता है। मस्तिष्क की रक्तवाहिका में रुकावट या रक्तस्राव से होने वाला स्ट्रोक एक गंभीर चिकित्सकीय आपातस्थिति है। समय पर पहचान और तत्काल उपचार से मस्तिष्क को होने वाली क्षति कम की जा सकती है।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप जैन ने बताया कि बच्चों में स्ट्रोक के लक्षणों को पहचानने में देरी हो सकती है, क्योंकि अभिभावकों को इस उम्र में स्ट्रोक होने की आशंका कम रहती है। बच्चे में अचानक चेहरे का एक तरफ टेढ़ा होना, शरीर के एक हिस्से में कमजोरी, बोलने या समझने में परेशानी, दृष्टि में बदलाव अथवा चलते समय संतुलन बिगड़ना चेतावनी के संकेत हैं। अचानक असामान्य तेज सिरदर्द, विशेषकर उल्टी या अत्यधिक सुस्ती के साथ, तथा पहली बार दौरा पड़ने पर भी तत्काल चिकित्सकीय मूल्यांकन आवश्यक है।
लक्षण पहचानने के लिए याद रखें—“BE FAST”
* B—Balance: अचानक संतुलन बिगड़ना।
* E—Eyes: अचानक देखने में परेशानी होना।
* F—Face: चेहरे का एक हिस्सा लटकना।
* A—Arm: एक हाथ या शरीर के एक तरफ कमजोरी होना।
* S—Speech: बोलने या बात समझने में कठिनाई होना।
* T—Time: बिना देर किए आपातकालीन चिकित्सा सहायता लेना।
नवजात और छोटे शिशुओं में शरीर के एक हिस्से में बार-बार दौरे आना, एक हाथ-पैर की गतिविधि कम होना या इतनी सुस्ती होना कि बच्चा सामान्य रूप से दूध पीने के लिए भी न जागे, गंभीर संकेत हो सकते हैं।
बच्चों में जन्मजात हृदय रोग, सिकल सेल रोग, रक्त के थक्के बनने की गड़बड़ी, मस्तिष्क की रक्तवाहिकाओं की बीमारियां तथा कुछ संक्रमण स्ट्रोक से जुड़े हो सकते हैं। हालांकि, पहले से कोई बीमारी ज्ञात नहीं होने पर भी स्ट्रोक की संभावना को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
अभिभावक क्या करें? लक्षण शुरू होने का समय और बच्चा आखिरी बार कब बिल्कुल सामान्य था, यह नोट करें। तुरंत एम्बुलेंस बुलाएं या निकटतम आपातकालीन विभाग पहुंचें। लक्षण अपने आप ठीक हो जाएं, तब भी जांच में देरी न करें। बच्चे को अपने स्तर पर एस्पिरिन या अन्य दवा न दें तथा खाने-पीने को कुछ न दें।
अस्पताल में आवश्यक मस्तिष्क स्कैन और अन्य जांचों के आधार पर उपचार तय किया जाता है। स्ट्रोक के बाद फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और नियमित अनुवर्ती देखभाल बच्चे की कार्यक्षमता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
संदेश स्पष्ट है—“अचानक चेहरा, हाथ या बोली में बदलाव—बच्चे को तुरंत अस्पताल पहुंचाएं।”
डॉ. प्रदीप जैन
वरिष्ठ शिशु एवं बाल रोग विशेषज्ञ
अध्यक्ष, एनएनएफ जोधपुर
सचिव, आईएमए जोधपुर







